Thursday 20th of August 2026

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जमीन पर एक बूंद पानी नहीं; बिलासपुर जांच टीम की जांच पर उठे गंभीर सवाल, वित्तीय अनियमितता के आरोपों पर घिरे CMO

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कटघोरा पाइपलाइन घोटाला: कागजों पर 77 लाख का भुगतान, : जमीन पर एक बूंद पानी नहीं; बिलासपुर जांच टीम की जांच पर उठे गंभीर सवाल, वित्तीय अनियमितता के आरोपों पर घिरे CMO

Shubh Arvind Sharma

Thu, Aug 20, 2026

कटघोरा पाइपलाइन घोटाला: कागजों पर 77 लाख का भुगतान, जमीन पर एक बूंद पानी नहीं; बिलासपुर जांच टीम की जांच पर उठे गंभीर सवाल, वित्तीय अनियमितता के आरोपों पर घिरे CMO

कटघोरा। कटघोरा नगरपालिका परिषद में जनता के टैक्स की गाढ़ी कमाई और सरकारी खजाने को कथित तौर पर चूना लगाने का एक ऐसा गंभीर मामला सामने आया है, जिसने पूरे प्रशासनिक महकमे को हिलाकर रख दिया है। एक ओर जहां आम जनता पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष कर रही है, वहीं दूसरी ओर विभागीय सांठगांठ के चलते बिना नियमों के तहत काम पूरा किए पूरे 77.74 लाख रुपये का कथित तौर पर फर्जी भुगतान करा लेने का एक सनसनीखेज आरोप लगा है। कागजों पर टेंडर पास हुए, कागजों पर ही प्रक्रियाएं पूरी हो गईं और देखते ही देखते लाखों रुपये का भुगतान भी आहरित कर लिया गया।

इस कथित महाफर्जीवाड़े के खिलाफ कटघोरा के सजग नागरिक अनिल अग्रवाल ने सीधे सचिव, नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्रालय (नवा रायपुर) को शिकायती पत्र भेजकर भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

प्रबुद्धजनों का तीखा सवाल: बाकी पार्षदों की चुप्पी के क्या हैं मायने?

इस पूरे सनसनीखेज मामले में जहां कांग्रेस के एक पार्षद ने भंडाफोड़ किया है, वहीं नगरपालिका के अन्य पार्षदों की इस विषय पर रहस्यमयी चुप्पी ने स्थानीय प्रबुद्धजनों और बुद्धिजीवियों को गहरे आक्रोश में डाल दिया है। क्षेत्र के जागरूक नागरिकों ने अब सीधे जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर तीखे और गंभीर सवाल खड़े करना शुरू कर दिया है:

* जनता की समस्याओं पर मौन क्यों? प्रबुद्धजनों का तीखा सवाल है कि आखिर वार्ड के अन्य पार्षद इस गंभीर समस्या पर अब तक मुखर क्यों नहीं हुए? क्या वे जनता की बुनियादी समस्याओं को लेकर गंभीर नहीं हैं?

* नाक के नीचे कैसे हो गया घोटाला? नागरिकों ने पूछा है कि क्या इन पार्षदों को अपने ही वार्डों की जमीनी हकीकत का पता नहीं था या फिर उनकी नाक के नीचे ही इतने बड़े कथित घोटाले को अंजाम दे दिया गया और वे सोते रहे?

* क्या पार्षदों की भी मूक सहमति है? क्षेत्र के बुद्धिजीवियों का सीधा आरोप है कि जब तक जनप्रतिनिधियों की मूक सहमति या संरक्षण न हो, तब तक अधिकारी और ठेकेदार इस तरह का दुस्साहस नहीं कर सकते। जनता अब यह साफ-साफ जानना चाहती है कि इस कथित भ्रष्टाचार के खेल में कौन-कौन पर्दे के पीछे शामिल है।

पक्ष जानने की कोशिश: सवालों से बच रहे मुख्य नगरपालिका अधिकारी (CMO)

पत्रकारिता के निष्पक्ष सिद्धांतों और कानूनी नियमों के तहत जब इस पूरे गंभीर मामले और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों पर कटघोरा नगरपालिका के मुख्य नगरपालिका अधिकारी (CMO) से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो उन्होंने फोन उठाना मुनासिब नहीं समझा। जिम्मेदार पद पर बैठे अधिकारी का इस तरह मीडिया के फोन से दूरी बना लेना और सवालों से बचना अपने आप में कई संदेहों को जन्म देता है। आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि सीएमओ साहब इस 77 लाख के कथित घपले पर मीडिया और जनता के सामने आने से कतरा रहे हैं?

कथित भ्रष्टाचार का पूरा क्रोनोलॉजी: दो टेंडर और 77 लाख का खेल

शासकीय दस्तावेजों के हवाले से शिकायत में साफ किया गया है कि 15वें वित्त आयोग की राशि में कथित अनियमितता करने के लिए योजनाबद्ध तरीके से दो अलग-अलग टेंडर जारी किए गए थे:

* पहला कथित विवाद (वार्ड क्र. 4, 5 और 10): इन वार्डों में ओ.पी.वी.सी. पाइपलाइन विस्तार के नाम पर 36.53 लाख रुपये का टेंडर (सूचना क्र. 164562) जारी हुआ। आरोप है कि धरातल पर तय मापदंडों के अनुसार काम का नामोनिशान नहीं था, फिर भी राशि निकाल ली गई।

* दूसरा कथित विवाद (वार्ड क्र. 8 और 15): इन वार्डों के लिए भी उसी दौरान 41.21 लाख रुपये की दूसरी निविदा (सूचना क्र. 164564) का खेल रचा गया। यहां भी बिना शत-प्रतिशत काम कराए पूरी रकम कथित तौर पर अफसरों और ठेकेदार ने आपस में बांट ली।

यानी कुल मिलाकर 77,74,000 रुपये की भारी-भरकम राशि का फाइनल पेमेंट उठा लिया गया, लेकिन जनता को पेयजल संकट से मुक्ति नहीं मिली।

PHE विभाग के अधिकारी का बड़ा प्रहार: "जनता को पानी नहीं देना चाहती पालिका"

इस मामले में सबसे बड़ा प्रशासनिक यू-टर्न तब आया जब खुद लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (PHE) विभाग के अधिकारी के एक बयान ने नगरपालिका को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया। PHE अधिकारी ने साफ शब्दों में कहा, "नगरपालिका कटघोरा की जनता को पानी देना ही नहीं चाहती है। हमारे विभाग द्वारा साल 2025 में ही पाइपलाइन का मुख्य कार्य पूरा कर दिया गया था। इसके बाद कुछ वार्डों में आगे का सुदृढ़ीकरण और कनेक्शन का काम नगरपालिका को करना था, जिसे उन्होंने पूरा नहीं किया और जनता को पानी के कनेक्शन से वंचित रखा।"

कांग्रेस पार्षद का भी महाविस्फोट: पुराने काम पर ही डाका डालने का दावा!

PHE अधिकारी के इस बयान की पुष्टि सत्तापक्ष कांग्रेस के ही एक जागरूक पार्षद के सनसनीखेज खुलासे से भी होती है। पार्षद ने पहले ही यह दावा कर नगरपालिका के दावों की धंज्जियां उड़ा दी थीं कि जिन वार्डों में नगरपालिका ने लाखों रुपये का नया काम होना दिखाया है, वहां वास्तव में PHE विभाग ने ही 2024-25 में पहले काम कर दिया था। आरोप है कि नगरपालिका के जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदार ने इसी पुराने काम को अपना नया काम बताकर सरकारी फाइलों में दर्ज किया और 77.74 लाख रुपये का फर्जी बिल बनाकर पूरी रकम साफ कर दी।

पाप छुपाने रातों-रात वार्ड में उतारी जेसीबी? शुरू हुआ खोदाई का पाखंड!

जैसे ही अनिल अग्रवाल ने पूरी ताकत से आवाज बुलंद करते हुए इस कथित फर्जीवाड़े की शिकायत सीधे मंत्रालय और पीएमओ (PMO) तक पहुंचाई, वैसे ही विभाग और ठेकेदारों में हड़कंप मच गया। कानूनी फंदे से बचने के लिए ठेकेदार द्वारा आनंद-फानन में वार्डों में जेसीबी (JCB) मशीनें उतार दी गईं और रातों-रात सड़कों को खोदना शुरू कर दिया गया।

स्थानीय जनता भली-भांति समझ चुकी है कि रातों-रात शुरू हुई यह खोदाई वार्डवासियों की प्यास बुझाने के लिए नहीं, बल्कि आने वाली जांच टीम की आंखों में धूल झोंकने की कथित साजिश है। कटघोरा की जनता अब इन जिम्मेदार अधिकारियों से सीधे तीखे सवाल पूछ रही है कि जब टेंडर का पूरा पैसा पहले ही फाइनल बिल के रूप में आहरित (निकाल) किया जा चुका है, तो आज महीनों बाद खोदाई कर क्या साबित करना चाहते हैं? क्या शासकीय नियमों में काम शुरू होने या अधूरा रहने पर ही पूरा भुगतान करने का कोई नया कानून आ गया है?

बिलासपुर की जांच टीम का दौरा और उसकी 'जांच' पर गंभीर सवाल

इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला और संदेहास्पद मोड़ तब आया, जब शिकायत के बाद बिलासपुर से एक विशेष जांच टीम भौतिक सत्यापन के लिए कटघोरा पहुंची। इस टीम ने बंद कमरों और प्रभावित वार्डों में क्या जांच की, किसे सही पाया और किसे गलत—यह आज भी एक गहरा रहस्य बना हुआ है। जांच के बाद भी मामले में कोई ठोस जमीनी कार्रवाई न होना जनता के गले नहीं उतर रहा है और इसने प्रशासनिक पारदर्शिता पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:

1. क्या बिलासपुर की जांच टीम ने जमीनी सच देखा? अगर देखा, तो क्या उन्हें भुगतान की तारीखों और भुगतान के बाद वर्तमान में चल रही खोदाई का अंतर्विरोध नजर नहीं आया?

2. जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा है? आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि जांच पूरी होने के बाद भी सच को दबाकर रखा गया है? क्या जांच टीम भी रसूखदारों के आगे नतमस्तक हो गई?

3. लापरवाह अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं? जब बिना काम के 77.74 लाख रुपये का भुगतान हो चुका था, तो जांच टीम ने ऑन-स्पॉट कार्रवाई करते हुए संबंधित सब-इंजीनियर या इंजीनियर को सस्पेंड करने की अनुशंसा क्यों नहीं की?

कलेक्टर से लेकर PMO और सीएमओ तक शिकायत, अब सीधे FIR की मांग

शिकायतकर्ता अनिल अग्रवाल ने इस कथित घोटाले की प्रतिलिपि प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO), छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO), नगरीय प्रशासन मंत्री, कलेक्टर (कोरबा) और संभागीय संयुक्त संचालक को भेजकर मामले को पूरी तरह से गर्म कर दिया है।

इस खुलासे के बाद कटघोरा की जनता में भारी आक्रोश है। मांग की जा रही है कि बिना स्थल निरीक्षण के फाइलों पर साइन करने वाले लापरवाह अधिकारियों को तुरंत सस्पेंड किया जाए, बिलासपुर जांच टीम की रिपोर्ट को तत्काल उजागर किया जाए और शासकीय राशि के इस कथित गबन के मामले में दोषियों के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्यवाही सुनिश्चित की जाए।

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कोरबा कटघोरा

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