: कटघोरा में करोड़ों की लूट! "चौपाटी-गार्डन" बना भ्रष्टाचार का प्रतीक, जनधन से किया गया महाघोटाला — जिम्मेदार अब भी बेखौफ!
Shubh Arvind Sharma
Fri, Jul 18, 2025
कटघोरा में करोड़ों की लूट!
"चौपाटी-गार्डन" बना भ्रष्टाचार का प्रतीक, जनधन से किया गया महाघोटाला — जिम्मेदार अब भी बेखौफ!
कटघोरा। विकास के नाम पर लूटा गया जनधन, फाइलों में दर्ज आंकड़े, मंच से उड़ते फीते, और धरातल पर भ्रष्टाचार की मोटी परत! जी हां, बात हो रही है कटघोरा नगर पालिका क्षेत्र में हाल ही में लोकार्पित चौपाटी और पुष्पवाटिका की, जिन्हें जनता के सपनों की बजाय अफसरों-ठेकेदारों की जेब भरने का साधन बना दिया गया।
10 जुलाई को जिस चौपाटी और गार्डन का लोकार्पण हुआ, उसकी भव्यता सिर्फ उद्घाटन के बैनर तक सीमित थी। असल में ये दोनों प्रोजेक्ट, करोड़ों की लूट और कमीशनखोरी की खुली किताब बन चुके हैं। नगर पालिका परिषद के चुनावों के बाद से जिस तरह से युवा अध्यक्ष के नाम पर ठेकेदारों की मनमानी शुरू हुई है, उसने यह साफ कर दिया है कि यहां अब "विकास" एक ढकोसला और "घोटाला" एक परंपरा बन चुका है।
नगर पालिका प्रशासन ने कागजों में दावा किया कि चौपाटी पर 19.41 लाख और पुष्पवाटिका पर 62.69 लाख रुपये खर्च किए गए। जबकि सच्चाई ये है कि दोनों ही स्थानों पर जाकर देखें तो हालत बेहद शर्मनाक है। चौपाटी में बैठने की समुचित व्यवस्था तक नहीं, स्ट्रीट लाइट अधूरी, फव्वारे गायब, टाइल्स अधपक्के और फिनिशिंग का नामोनिशान नहीं। वहीं पुष्पवाटिका में पौधों की बजाय मिट्टी, गड्ढे और कूड़े का साम्राज्य दिखता है।
जनता का पैसा... किसी की जागीर?
DMF फंड जिसे खनिज प्रभावित क्षेत्रों के जनकल्याण के लिए उपयोग होना चाहिए, उस फंड की खुली लूट कर दी गई। निर्माण कार्य के नाम पर बिल फुलाए गए, क्वालिटी का गला घोंटा गया और भुगतान की रफ्तार से साफ है कि सब कुछ पूर्व नियोजित था। सूत्रों का कहना है कि इन योजनाओं में 30 से 50 प्रतिशत तक कमीशन का खेल खेला गया, और पैसा बंटा — ठेकेदार से लेकर कार्यालय तक।
कौन है इस घोटाले का असली मास्टरमाइंड?
नगरपालिका के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो कुछ ठेकेदार लंबे समय से अधिकारियों के संरक्षण में काम कर रहे हैं। इन्हीं लोगों को मनमानी तरीके से टेंडर दिए जाते हैं, और फिर "काम बाद में, भुगतान पहले" की नीति पर लाखों-करोड़ों की रकम पार कर दी जाती है। इस पूरे मामले में नगर पालिका अध्यक्ष की भूमिका को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं — क्या वे सिर्फ मूक दर्शक हैं या पर्दे के पीछे से संरक्षण दे रहे हैं?
CMO के जांच की बात — सिर्फ एक झूठा बयान!
नगर पालिका के सीएमओ ने मीडिया में बयान दिया था कि इन कार्यों की जांच कराई जाएगी। लेकिन आज तक कोई जांच प्रारंभ नहीं हुई, न ही किसी भी जिम्मेदार को नोटिस भेजा गया। यानी साफ है कि मामला या तो दबाया जा रहा है या फिर मिलीभगत इतनी गहरी है कि कोई बोलने को तैयार नहीं।
कटघोरा की जनता से खुला धोखा — क्या यही है नया प्रशासनिक मॉडल?
विकास के नाम पर जनता की आंखों में धूल झोंकना, योजनाओं के नाम पर फर्जीवाड़ा करना और फिर जांच के नाम पर सिर्फ बयानबाज़ी — यही अब सिस्टम का चेहरा बन चुका है। कटघोरा की जनता पूछ रही है — आखिर कब तक उनके पैसों को ऐसे लूटा जाता रहेगा? क्या कोई ईमानदार अफसर सामने आएगा जो इस घोटाले की परतें खोलेगा? या फिर ये मामला भी दूसरी फाइलों की तरह धूल खाता रहेगा?
कटघोरा की जनता को अब सड़कों पर उतरने की जरूरत है। यह लड़ाई सिर्फ एक गार्डन या चौपाटी की नहीं, यह लड़ाई उस पूरे सिस्टम से है जिसने जनता के पैसे को अपनी निजी जागीर समझ लिया है। अब सिर्फ एक सवाल है — क्या होगी जांच या सब मिलकर लूट का जश्न मनाते रहेंगे?
👉 आवश्यकता है एक स्वतंत्र जांच एजेंसी द्वारा पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की।
👉 जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदारों की संपत्ति की जांच हो।
👉 भ्रष्टाचारियों को बर्खास्त कर FIR दर्ज की जाए।
जनता सब जानती है... अब जवाब और कार्रवाई दोनों चाहिए!
10 जुलाई को जिस चौपाटी और गार्डन का लोकार्पण हुआ, उसकी भव्यता सिर्फ उद्घाटन के बैनर तक सीमित थी। असल में ये दोनों प्रोजेक्ट, करोड़ों की लूट और कमीशनखोरी की खुली किताब बन चुके हैं। नगर पालिका परिषद के चुनावों के बाद से जिस तरह से युवा अध्यक्ष के नाम पर ठेकेदारों की मनमानी शुरू हुई है, उसने यह साफ कर दिया है कि यहां अब "विकास" एक ढकोसला और "घोटाला" एक परंपरा बन चुका है।
नगर पालिका प्रशासन ने कागजों में दावा किया कि चौपाटी पर 19.41 लाख और पुष्पवाटिका पर 62.69 लाख रुपये खर्च किए गए। जबकि सच्चाई ये है कि दोनों ही स्थानों पर जाकर देखें तो हालत बेहद शर्मनाक है। चौपाटी में बैठने की समुचित व्यवस्था तक नहीं, स्ट्रीट लाइट अधूरी, फव्वारे गायब, टाइल्स अधपक्के और फिनिशिंग का नामोनिशान नहीं। वहीं पुष्पवाटिका में पौधों की बजाय मिट्टी, गड्ढे और कूड़े का साम्राज्य दिखता है।
जनता का पैसा... किसी की जागीर?
DMF फंड जिसे खनिज प्रभावित क्षेत्रों के जनकल्याण के लिए उपयोग होना चाहिए, उस फंड की खुली लूट कर दी गई। निर्माण कार्य के नाम पर बिल फुलाए गए, क्वालिटी का गला घोंटा गया और भुगतान की रफ्तार से साफ है कि सब कुछ पूर्व नियोजित था। सूत्रों का कहना है कि इन योजनाओं में 30 से 50 प्रतिशत तक कमीशन का खेल खेला गया, और पैसा बंटा — ठेकेदार से लेकर कार्यालय तक।
कौन है इस घोटाले का असली मास्टरमाइंड?
नगरपालिका के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो कुछ ठेकेदार लंबे समय से अधिकारियों के संरक्षण में काम कर रहे हैं। इन्हीं लोगों को मनमानी तरीके से टेंडर दिए जाते हैं, और फिर "काम बाद में, भुगतान पहले" की नीति पर लाखों-करोड़ों की रकम पार कर दी जाती है। इस पूरे मामले में नगर पालिका अध्यक्ष की भूमिका को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं — क्या वे सिर्फ मूक दर्शक हैं या पर्दे के पीछे से संरक्षण दे रहे हैं?
CMO के जांच की बात — सिर्फ एक झूठा बयान!
नगर पालिका के सीएमओ ने मीडिया में बयान दिया था कि इन कार्यों की जांच कराई जाएगी। लेकिन आज तक कोई जांच प्रारंभ नहीं हुई, न ही किसी भी जिम्मेदार को नोटिस भेजा गया। यानी साफ है कि मामला या तो दबाया जा रहा है या फिर मिलीभगत इतनी गहरी है कि कोई बोलने को तैयार नहीं।
कटघोरा की जनता से खुला धोखा — क्या यही है नया प्रशासनिक मॉडल?
विकास के नाम पर जनता की आंखों में धूल झोंकना, योजनाओं के नाम पर फर्जीवाड़ा करना और फिर जांच के नाम पर सिर्फ बयानबाज़ी — यही अब सिस्टम का चेहरा बन चुका है। कटघोरा की जनता पूछ रही है — आखिर कब तक उनके पैसों को ऐसे लूटा जाता रहेगा? क्या कोई ईमानदार अफसर सामने आएगा जो इस घोटाले की परतें खोलेगा? या फिर ये मामला भी दूसरी फाइलों की तरह धूल खाता रहेगा?
कटघोरा की जनता को अब सड़कों पर उतरने की जरूरत है। यह लड़ाई सिर्फ एक गार्डन या चौपाटी की नहीं, यह लड़ाई उस पूरे सिस्टम से है जिसने जनता के पैसे को अपनी निजी जागीर समझ लिया है। अब सिर्फ एक सवाल है — क्या होगी जांच या सब मिलकर लूट का जश्न मनाते रहेंगे?
👉 आवश्यकता है एक स्वतंत्र जांच एजेंसी द्वारा पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की।
👉 जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदारों की संपत्ति की जांच हो।
👉 भ्रष्टाचारियों को बर्खास्त कर FIR दर्ज की जाए।
जनता सब जानती है... अब जवाब और कार्रवाई दोनों चाहिए!Tags :
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